मकर संक्रांति :-वाराणसी की फ़िज़ा में घुलने लगी गुड़ और उससे बने सामानों की खुशबू

वाराणसी। मकर संक्रांति के पर्व पर गुड़ से बने सामानों को खाने की परम्परा है। ऐसे में बनारस की फ़िज़ा में इन दिनों गुड़ की खुशबू घुलना शुरू हो गयी है। शहर के विभिन्न इलाकों में कारीगर गुड़ से तरह-तरह के सामान बनाने में लग गए हैं। गुड़ की पट्टी, लाई-ढूंढा, दाल की पट्टी, काले तिल का लड्डू, सफ़ेद तिल और गुड़ का लड्डू, तिलकुट आदि कारीगर तेज़ी से तैयार करने में लगे हैं, तो बाज़ारों में दुकानें भी सज गयी हैं।

Live Varanasi: ने बनारस की फ़िज़ा में घुले गुड़ के इस रस पर कारीगरों और दुकानदारों से बात की, पेश है इस बातचीत के कुछ ख़ास अंश।

एक दिन मे एक से दो कुंतल माल हो रहा तैयार:

कई पीढ़ियों से इस कार्य में लगे हुए सुशील कुमार ने बताया कि वो लोग गाज़ीपुर के रहने वाले हैं पर वर्षों से बनारस में रहते हैं। हमारा खानदानी काम है। घर के सभी सदस्य इस काम को दिसंबर माह से शुरू कर देते हैं बनाना, तैयारी नवंबर से ही शुरू हो जाती है। ओमप्रकाश ने बताया कि रोज़ाना एक से दो कुंतल गुड़ का माल तैयार होता है।

पट्टी से लेकर तिलकुट तक होता है तैयार:

सुशिल कुमार ने बताया कि यहां बादाम पट्टी, गुड़ पट्टी, दाल की पट्टी, तिलकुट आदि तैयार किया जाता है। इस वर्ष कोरोना में थोड़ी राहत की वजह से बनारस के अलावा आस-पास के जनपदों से भी लोग खरीदारी करने आ रहे हैं। एक दिन में दो कुंतल बन रही गुड़ की बादाम पट्टी वहीँ कारीगर सुभाष ने बताया कि एक दिन में दो कुन्तल बादाम पट्टी और एक से सवा कुंतल लाई-ढूंढा बन जा रहा है। पहले जैसी मार्केट नहीं है पर फिर भी एक दिन में हम इतना माल बेच ले रहे हैं।

कोरोना से ग्राहक हुए कम :

सड़क पर दुकान लगाए विजय कुमार ने बताया कि काशी की पट्टी और खजूर की पट्टी के अलावा दाल की पट्टी का काफी क्रेज़ है। लोग बाहर से भी इसकी डीमांड करते हैं और मंगवाते हैं। कोरोना की वजह से मार्केट में खरीदार कम हैं पर फिर भी बिक्री हो रही है।

महंगाई ने तोड़ी कमर:

वहीँ एक अन्य बृजेश ने बताया कि बीते दो सालों में कोरोना ने सभी त्योहारों पर कहीं ना कहीं ग्रहण लगा रखा है। लेकिन ये कहना भी गलत नहीं होगा कि बढ़ती महंगाई ने भी त्यौहारों को फीका करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कभी जहाँ बाज़ारों में पैर रखने की भी जगह नहीं होती थी आज वो खाली है।

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