श्रीमद् भागवत कथा के रसपान से पापो का होता है नाश

पिंडरा।
परमपूज्य संत श्री चक्रधर दास जी महाराज ने कहाकि कलियुग में श्रीमद् भागवत महापुराण श्रवण कल्पवृक्ष से भी बढ़कर है। क्योंकि कल्पवृक्ष मात्र तीन वस्तु अर्थ, धर्म और काम ही दे सकता है। मुक्ति और भक्ति नही दे सकता है। लेकिन श्रीमद् भागवत तो दिव्य कल्पतरु है यह अर्थ, धर्म, काम के साथ साथ भक्ति और मुक्ति प्रदान करके जीव को परम पद प्राप्त कराता है।
उक्त बातें करखियाव गांव में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के दौरान कही। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत केवल पुस्तक नही साक्षात श्रीकृष्ण स्वरुप है। भागवत के चार अक्षर का तात्पर्य यह है कि भा से भक्ति, ग से ज्ञान, व से वैराग्य और त त्याग जो हमारे जीवन में प्रदान करे उसे हम भागवत कहते है।
श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन सभी ने भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव उत्साह और उमंग के साथ मनाया।
कथा मे काशी से आये विद्वान ब्राह्मण अरूण आचार्य महराज, गोविन्द महराज,रामदास महराज, आनन्द महराज,अखिलेश महराज,  विक्रमादित्य सिंह,अशोक सिंह, निहाला सिंह,राधेश्याम सिंह,जितेंद्र सिंह,जयप्रकाश सिंह,महातिम सिंह,जिलेदार सिंह,सन्तोष सिंह,धनंजय सिंह, शैलेष सिंह, सत्यप्रकाश सिंह, समेत कई लोग उपस्थित रहे।

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