लघु भारत काशी में बहुरंगी है मकर संक्रांति, तीर्थभूमि में विविध संस्कृति के होते हैं दर्शन

वाराणसी

पर्वोत्सवों की रसिया काशी नगरी एकमेव ऐसी रंगभूमि है, जो बारहों महीने अबाध रूप से प्रतिदिन कोई न कोई पर्वोत्सव मनाती है। देश के हर राज्य, धर्म, संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली यह तीर्थ नगरी अपने इसी वैशिष्ट्य के कारण पूरे विश्व में लघु भारत के नाम की ख्याति से अलंकृत है। राष्ट्रगान में वर्णित पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल बंग… की पंक्तियों को सही अर्थों में परिभाषित करने वाली इस तीर्थपुरी का महात्म्य ही ऐसा है। इस तीर्थपुरी में यदि होली, दीपावली, दशहरा एक रूप-स्वरूप, एक रसरंग के पर्व हैं तो गवरजा माता उत्सव (राजस्थान), गरबा (गुजरात), कोलू (तमिलनाडु), नरक चतुर्दशी (पंच द्राविड़) तो गुडी पड़वा (महाराष्ट्र) विभिन्न समुदायों की अलग-अलग लोक रीतियों से सजाए जाने वाले पर्वोत्सव हैं। एक मकर संक्रांति पर्व ही ऐसा त्योहार है जो भारतीय जीवन दर्शन से जुड़े सभी समुदायों में एक साथ मनाया जाता है। यह बात और कि ओज-तेज के देवता सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण (पथ परिवर्तन) होने के इस प्रतीक पर्व को मनाने की रीतियों के रंग एक दूसरे से सर्वथा विलग पाए जाते हैं। ऋतु परिवर्तन का प्रथम संदेश लेकर आने वाले इस बहुरंगी पर्व को अगर पूर्वांचल में खिचड़ी का संबोधन प्राप्त है तो नगर की पंजाबी बस्ती में इसका रूप लोहिड़ी का है। नगर की द्राविड़ (तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र, तेलंगाना) बस्तियों में इसका रूप पोंगल के उमंगों भरे उत्सव का है।

तीन दिनी उत्सव है पोंगल

श्रीरामतारक आंध्रा आश्रम के प्रबंधक वीवी सुंदर शास्त्री बताते हैं कि देश के दक्षिण भाग में मकर संक्रांति को पोंगल के स्वरूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि नई फसल (धान, गन्ना) की कटाई के बाद इसका पहला भोग सूर्यदेव को चढ़ाया जाता है। सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में जाने से पहले घर की साफ-सफाई की जाती है। जो भी पुराने खराब वस्त्र होते हंै उनकी होलिका जलाई जाती है। संक्रांति के दिन नए चावल और गुड़ से खीर बनाया जाता है। सूर्य को चढ़ाने के बाद इसे प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। तीसरे दिन चावल से बने व्यंजन को गो-ग्रास कराया जाता है।

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